करीब पांच साल बाद शुरू हुई कैलाश मानसरोवर यात्रा में शुक्रवार को पहला दल लिपुलेख दर्रा पार कर तिब्बत (चीन) पहुंच गया है। 52 सदस्यीय दल ने सुबह 9 बजे सीमा पार की, जहां चीनी सुरक्षा एजेंसियों ने यात्रियों के दस्तावेजों की जांच के बाद उन्हें प्रवेश दिया। पहला दल सुबह 7 बजे नाभीढांग से लिपुलेख दर्रे के लिए रवाना हुआ। दल में 48 श्रद्धालु, एक चिकित्सा कर्मी और तीन किचन स्टाफ शामिल थे। आईटीबीपी के जवान यात्रियों को सीमा तक लेकर पहुंचे। लिपुलेख दर्रे पर चीनी सुरक्षा एजेंसियों ने यात्रियों के दस्तावेजों की जांच की, जिसके बाद दल को चीनी प्रशासन की निगरानी में कैलाश मानसरोवर यात्रा के अगले चरण के लिए रवाना कर दिया गया। वहीं, तवाघाट-गुंजी सड़क कुछ समय बंद रहने से दूसरा दल देर से रवाना हुआ, लेकिन दोपहर तक सभी यात्री सुरक्षित गुंजी पहुंच गए। सड़क बंद होने से दूसरा दल डेढ़ घंटे रुका यात्रा का दूसरा दल शुक्रवार को धारचूला से गुंजी के लिए निकला। तवाघाट-गुंजी सड़क पर भूस्खलन के कारण मार्ग कुछ समय के लिए बंद हो गया, जिससे यात्रियों को करीब डेढ़ घंटे इंतजार करना पड़ा। सड़क खुलने के बाद दल आगे बढ़ा और दोपहर तक सभी यात्री गुंजी पहुंच गए। प्रशासन और कुमाऊं मंडल विकास निगम (केएमवीएन) ने यात्रा मार्ग पर भोजन, आवास, स्वास्थ्य और सुरक्षा की व्यवस्थाएं बनाए रखीं। मौसम को देखते हुए यात्रियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा पर लगातार निगरानी की जा रही है। टनकपुर में CM धामी ने दिखाई थी हरी झंडी कैलाश मानसरोवर यात्रा इस वर्ष करीब पांच साल बाद उत्तराखंड के टनकपुर-लिपुलेख मार्ग से फिर शुरू हुई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 5 जुलाई को टनकपुर से पहले दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। इस वर्ष लिपुलेख मार्ग से 10 दलों में कुल 500 श्रद्धालु यात्रा करेंगे। अब कितना आसान हुआ सफर इस बार कैलाश मानसरोवर यात्रा की कुल दूरी 1738 किलोमीटर होगी। इसमें लगभग 1690 किलोमीटर यात्रा वाहन से और सिर्फ 38 किलोमीटर पैदल ट्रेक रहेगा। साल 2019 से पहले यात्रियों को धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक 60 किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलना पड़ता था। रास्ते में ऑक्सीजन की कमी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यात्रा काफी चुनौतीपूर्ण होती थी। अब भारत और चीन दोनों तरफ सड़क बनने के बाद यह यात्रा काफी आसान हो गई है। सीमावर्ती क्षेत्र तक वाहन पहुंचने लगे हैं, जिससे बुजुर्ग और पहली बार यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी यह यात्रा पहले की तुलना में ज्यादा सुलभ हो गई है। 2020 से बंद यात्रा इस साल फिर हुई शुरू कैलाश मानसरोवर यात्रा वर्ष 2020 से बंद थी। पहले कोरोना महामारी और बाद में पूर्वी लद्दाख के गलवान क्षेत्र में भारत-चीन सीमा पर सैन्य तनाव के कारण यात्रा का संचालन लगातार बंद रहा। दोनों देशों के बीच सहमति बनने के बाद इस वर्ष यात्रा दोबारा शुरू हुई है। उत्तराखंड के लिपुलेख मार्ग से जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए टनकपुर पहला प्रमुख पड़ाव है। यहां से यात्री पिथौरागढ़, धारचूला और गुंजी होते हुए लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर पहुंचेंगे। इस बार यात्रा के लिए दो मार्ग निर्धारित किए गए हैं – उत्तराखंड का लिपुलेख दर्रा और सिक्किम का नाथूला दर्रा। क्यों खास है इस साल की यात्रा इस साल की कैलाश मानसरोवर यात्रा धार्मिक दृष्टि से भी बेहद खास मानी जा रही है। 60 वर्षों बाद अग्नि अश्व वर्ष का दुर्लभ योग बन रहा है, जिसे हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति का महत्वपूर्ण समय माना जाता है। तिब्बती ज्योतिष दौलत रायपा के अनुसार यह 60 साल के चक्र का विशेष वर्ष होता है। मान्यता है कि इस वर्ष की गई एक परिक्रमा का फल सामान्य वर्षों की 12 परिक्रमा के बराबर होता है। इसी वजह से इस बार देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर से श्रद्धालुओं के इस यात्रा में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। —————– ये खबर भी पढ़ें : भारत-चीन व्यापार की शुरुआत टली: गुंजी में इंतजार कर रहे 100 भारतीय व्यापारी; चीन ने कहा- दुकानों और गोदामों का काम जारी उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से छह साल बाद शुरू होने जा रहे परंपरागत भारत-चीन व्यापार की शुरुआत एक बार फिर टल गई है। भारतीय व्यापारियों को 8 जुलाई तक चीन के तकलाकोट पहुंचना था, लेकिन वहां मंडी, दुकानें और गोदाम तैयार नहीं होने से व्यापार की तारीख आगे बढ़ गई। पढ़ें पूरी खबर…

कैलाश मानसरोवर यात्रा का पहला दल चीन पहुंचा:लिपुलेख दर्रे पर चीनी सुरक्षा एजेंसियों ने दस्तावेज जांचे, दूसरा जत्था गुंजी पहुंचा
करीब पांच साल बाद शुरू हुई कैलाश मानसरोवर यात्रा में शुक्रवार को पहला दल लिपुलेख दर्रा पार कर तिब्बत (चीन) […]