सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन में हिंसा को लेकर एक याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि युवाओं की बात सुनना सबसे ताकतवर हथियार है। कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को संयम रखना चाहिए। अगर कुछ भटके हुए युवक पत्थरबाजी भी करें, तब भी उन्हें समझाने और शांत करने की कोशिश करनी चाहिए। सरकार को भी आक्रामक रवैया अपनाने से बचना चाहिए। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की बेंच ने यह टिप्पणी रिटायर्ड एयरफोर्स अफसर मनीष कुमार सोलंकी की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिका में 20 जुलाई के 'संसद चलो' मार्च के आयोजकों यानी CJP प्रतिनिधियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। कोर्ट ने इस याचिका को इसी मामले से जुड़ी दूसरी याचिका के साथ जोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट बोला- युवाओं को काउंसलिंग मिलनी चाहिए, 4 टिप्पणी 1. भटके युवाओं को समझाने की जरूरत: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अगर कुछ भटके हुए युवक पत्थरबाजी करते हैं, तब भी उन्हें समझाने और सलाह देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि उन्हें काउंसलिंग मिलनी चाहिए। अगर सरकार आक्रामक रवैया अपनाएगी, तो हालात और बिगड़ सकते हैं और हिंसा बढ़ सकती है। इससे बचना चाहिए। 2. पुलिस संयम रखे, शांतिपूर्ण प्रदर्शन को बढ़ावा दे; CJI ने कहा कि सबसे जरूरी बात शांतिपूर्ण प्रदर्शन को बढ़ावा देना है। अगर कोई घटना हो भी जाती है, तो पुलिस को बहुत संयम से काम लेना चाहिए, ताकि हालात नियंत्रण से बाहर न जाएं। जहां भी ऐसी घटनाएं हों, वहां बहुत सावधानी से स्थिति संभालनी चाहिए। 3. युवाओं को हिंसा की राह पर जाने से रोकना होगा: CJI ने कहा कि बहुत सोच-समझकर कदम उठाने होंगे, ताकि युवा हिंसा की राह पर न जाएं। सबसे अच्छा तरीका है उन्हें समझाना और शांत करना। उनकी बात सुनिए और समझिए कि वे आखिर क्यों विरोध कर रहे हैं। 4. कानून-व्यवस्था एजेंसियों के विवेक पर छोड़ें: अंत में CJI ने कहा कि ऐसे मामलों से कैसे निपटना है, यह कानून लागू करने वाली एजेंसियों पर छोड़ देना चाहिए। उन्हें ऐसी परिस्थितियों से निपटने का अनुभव हमसे और आपसे ज्यादा है। याचिकाकर्ता ने कहा- सरकार को झुकना नहीं चाहिए, 4 दलीलें… 1. 15 दिन बाद भी आयोजकों पर कार्रवाई नहीं: याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील रिजवान अहमद ने कहा कि दिल्ली में 20 जुलाई को हुई घटना के 15 दिन बीत चुके हैं, लेकिन आयोजकों की जवाबदेही तय नहीं हुई। उन्होंने कहा कि आयोजक लगातार टीवी चैनलों पर जाकर भड़काऊ बयान दे रहे हैं और माहौल शांत करने की कोशिश नहीं कर रहे। 2. सरकार प्रदर्शनकारियों के आगे न झुके: वकील ने राजस्थान की हालिया कानून-व्यवस्था की घटना का हवाला देते हुए कहा कि सरकार को प्रदर्शनकारियों के आगे नहीं झुकना चाहिए। उन्होंने कहा- राजस्थान में एक युवक की मौत हो चुकी है। अगर दिल्ली में सरकार झुकती है, तो यह दूसरी जगहों पर भी उदाहरण बनेगा। कल लखनऊ में कॉलेज के छात्र भी मांगों को लेकर बसों पर पत्थर फेंकेंगे, तो क्या वहां की सरकार भी झुक जाएगी? 3. पत्थरबाजी करने वालों को छोड़ना खतरनाक होगा: वकील ने कहा कि पत्थरबाजी करने वालों को सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता कि सरकार दबाव में है। उन्होंने कहा- यह बहुत खतरनाक उदाहरण होगा। तीन साल पहले किसान सिंघु बॉर्डर पर थे। कल जनरेशन अल्फा, बीटा या दूसरी पीढ़ियां भी इसी तरह आंदोलन करेंगी। 4. संसद लोकतंत्र का मंदिर, जवाबदेही तय हो: वकील ने कहा कि संसद लोकतंत्र का मंदिर है। अगर 500 लोग संसद परिसर में घुस जाते, तो कौन जानता है कि उनके पास देसी कट्टा या कोई हथियार नहीं होता? अगर वे गोली चला देते तो क्या होता? उन्होंने कहा कि वे किसी हाईवे या रेलवे ट्रैक पर नहीं जा रहे थे, बल्कि लोकतंत्र के मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। इसलिए सभी की जवाबदेही तय होनी चाहिए। 3 अगस्त: सरकार बोली- छात्रों पर FIR नहीं होगी, वादा निभाएंगे संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा मामले पर 3 जुलाई की सुनवाई में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि NEET पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार अपने वादे पर कायम है और छात्रों के खिलाफ FIR दर्ज नहीं की जाएगी। पूरी खबर पढ़ें… 28 जुलाई: SC बोला- 18 साल से कम उम्र के प्रदर्शनकारियों को रिहा करें 28 जुलाई की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई न करने का निर्देश दिया था। अदालत ने यह भी कहा था कि 18 साल से कम उम्र के ऐसे प्रदर्शनकारियों को रिहा किया जाए, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। कोर्ट ने महाराष्ट्र, बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केरल सरकार को नोटिस जारी किए थे। पूरी खबर पढ़ें… 20 जुलाई को संसद मार्च में हुआ था लाठीचार्ज 20 जुलाई को दिल्ली में 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़पें हुईं। सुरक्षाकर्मियों ने संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। प्रदर्शनकारी NEET पेपर लीक मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। 25 जुलाई को प्रधान के इस्तीफे और जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने की मांग मान लेने के साथ ही आंदोलन खत्म हो गया था। पहले भी 3 बार सुप्रीम कोर्ट पहुंची CJP से जुड़ी याचिका 1. पहली बार- 24 मई, मांग थी- CJP बनाने वालों की गतिविधियों की जांच CBI करे याचिकाकर्ता के वकील एनके गोस्वामी का दावा था कि CJP, ज्यूडीशियरी की इमेज खराब कर रही है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर तुरंत सुनवाई से इनकार कर दिया। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने कहा, ‘इसे इतनी भावुकता से मत लें।’ पढ़ें पूरी खबर… 2. दूसरी बार- 22 जुलाई, मांग थी- कॉकरोच पार्टी के समर्थकों पर लाठीचार्ज की जांच हो एक वकील ने CJI की अगुआई वाली 3 जजों की बेंच के सामने जनहित याचिका लगाई थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता वकील ने कहा- छात्र महत्वपूर्ण मुद्दे उठा रहे हैं। लेकिन उन पर पुलिस की बर्बरता के वीडियो भी हैं। यदि संभव हो तो मामले की सुनवाई जल्द की जाए। इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा था, ‘हमें वीडियो में दिलचस्पी नहीं है, हमारे पास देखने का समय नहीं है।’ पढ़ें पूरी खबर… 3. तीसरी बार- 24 जुलाई, मांग थी- पुलिस पर कंट्रोल जरूरी, कोर्ट हमारे बीच आ रहा है इस बार मामला सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने उठाया। उन्होंने कोर्ट में बताया प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की हिंसा से जुड़ी 2 याचिकाएं दायर की गई हैं। इससे पहले एक दूसरे मामले की सुनवाई के दौरान CJI ने कहा था- मैंने CJP के प्रदर्शन के दौरान हुए लाठीचार्ज से जुड़ी किसी भी याचिका की सुनवाई से इनकार नहीं किया। सच ये है कि कोई रिट याचिका दाखिल ही नहीं की गई थी। मीडिया ने भी गलत खबरें चलाईं। पढ़ें पूरी खबर…