सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें हाईकोर्ट ने कहा था कि बंद कमरे में जबरदस्ती महिला का सीना दबाना, सलवार उतारने की कोशिश करना रेप की कोशिश नहीं है। हाईकोर्ट ने 9 जुलाई को यह आदेश दिया और आरोपी को बरी कर दिया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने इस पर हैरानी जताई। उन्होंने कहा- जजों को संवेदनशील होना चाहिए और रिसर्च करनी चाहिए। जज कानूनी पड़ताल के बिना फैसले दिए जा रहे हैं। हम पटना हाईकोर्ट के फैसले की विस्तार से समीक्षा करके विस्तृत आदेश जारी करेंगे। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट 14 जुलाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें कहा गया था- नाबालिग लड़की का स्तन पकड़ना, उसके पायजामे की डोरी तोड़ना रेप का प्रयास नहीं है। इस पर सुनवाई के दौरान एडवोकेट गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के सामने पटना हाईकोर्ट के फैसले का जिक्र किया। इसके बाद CJI सूर्यकांत ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) की एक्सपर्ट कमेटी की उस रिपोर्ट को भी मंजूरी दी, जिसमें यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान संवेदनशीलता बनाए रखने के लिए दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने देश की सभी अदालतों को निर्देश दिया कि वे इस गाइडलाइन का सख्ती से पालन करें। बिहार का केस और पटना हाईकोर्ट का फैसला 18 साल पहले 20 जनवरी 2008 को बिहार के बांका में एक स्टूडियो के मालिक के खिलाफ रेप की कोशिश की FIR हुई। युवती ने आरोप लगाया कि वह पिता के साथ फोटो खिंचवाने गई थी। स्टूडियो मालिक हिमांशु फोटो खींचने के बहाने उसे अंदर ले गया और पिता को बाहर इंतजार करने को कहा। युवती ने कहा- अंदर जाते ही हिमांशु ने स्टूडियो का दरवाजा बंद कर लिया। अपने कपड़े उतारे और मेरी सलवार उतारने की कोशिश की। रेप करने के इरादे से छाती दबाने लगा और जबरन छेड़छाड़ की। 2013 में बांका कोर्ट ने हिमांशु को रेप का प्रयास और बंधक बनाने का दोषी करार दिया था। 3 साल कारावास की सजा सुनाई। लोअर कोर्ट के फैसले को हिमांशु ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। पटना हाईकोर्ट में 13 साल चला केस हिमांशु के वकील ने पटना हाईकोर्ट में दलील दी कि निचली अदालत का फैसला गैरकानूनी है। उन्होंने तर्क दिया कि पीड़ित पक्ष ने FIR में देरी की और उचित कारण नहीं बताया। पीड़िता के वकील ने कहा कि निचली अदालत ने गवाहों और सबूतों पर विचार करने के बाद ही फैसला दिया था। हिमांशु का अपराध बेहद गंभीर प्रकृति का है। 13 साल बाद 9 जुलाई 2026 को पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने कहा- इस मामले में मेडिकल एविडेंस नहीं है। रेप करने की कोशिश में भी स्पष्ट शारीरिक प्रयास के प्रमाण नहीं है। इसलिए आरोपी को बरी किया जाता है। हाईकोर्ट ने फैसले में 3 बातों को आधार बनाया 1. पेनिट्रेशन का कोई सबूत नहीं कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने बल का प्रयोग किया, दरवाजा बंद किया, सलवार उतारने की कोशिश की और उसकी छाती दबाकर शारीरिक उत्पीड़न किया। हालांकि, ये घटना रेप के प्रयास की बजाय मर्यादा को ठेस पहुंचाने वाली है। पेनिट्रेशन का सबूत नहीं है और ना ही रेप करने के प्रयास की मेडिकल पुष्टि है। रेप के प्रयास की पुष्टि के लिए मेडिकल सबूत नहीं है। 2. चिकित्सा अधिकारी की गवाही नहीं कोर्ट ने कहा कि इस केस में बहुत खामियां हैं। कोर्ट ने कहा कि 5 गवाहों में एक ही स्वतंत्र गवाह था, जो मुकर गया। जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल करने वाले जांच अधिकारी से मुकदमे के दौरान पूछताछ तक नहीं नहीं की गई थी। इसके अलावा चिकित्सा अधिकारी की भी गवाही नहीं कराई गई। 3. सिर्फ माता-पिता ही मुख्य गवाह इस मामले में पीड़िता के माता-पिता ही मुख्य गवाह हैं, जिनका इस मामले के नतीजे से सीधा संबंध है। अदालतें मानती आई हैं कि ऐसे गवाह अपने पक्ष में तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकते हैं। प्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी पर पीड़िता का बयान स्वीकार्य है कि पुलिस स्टेशन में थाना प्रभारी ने शुरू में केस दर्ज करने से मना कर दिया था, जिस कारण अगले दिन FIR हुई। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला दिया सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा- यौन अपराधों में पीड़िता की गवाही सजा के लिए पर्याप्त हो सकती है, लेकिन इसके लिए गवाही का बेदाग और पूरी तरह से विश्वसनीय होना अनिवार्य है। गवाही में विरोधाभास हैं, तो बिना स्वतंत्र पुष्टि के आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यहां युवती के बयानों में कई तरह का विरोधाभास है। सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन, 3 जरूरी सवालों के जवाब 1. गाइडलाइन बनाने का आदेश कब और क्यों दिया?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मार्च 2025 में आदेश दिया कि नाड़ा तोड़ना, निजी अंग पकड़ना रेप की कोशिश नहीं सिर्फ क्राइम की तैयारी थी, वास्तविक प्रयास नहीं। इसी केस पर सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 को आदेश दिया- यह रेप की कोशिश ही है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी को यौन अपराध मामलों की सुनवाई के लिए गाइडलाइंस तैयार करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि इसका मकसद न्यायाधीशों में संवेदनशीलता और करुणा विकसित करना होना चाहिए, ताकि ऐसे मामलों की सुनवाई पीड़ित केंद्रित और गरिमापूर्ण तरीके से हो। खासतौर पर कहा कि गाइडलाइंस में भारत का सामाजिक तानाबाना दिखना चाहिए, इन्हें विदेशों की न्यायिक व्यवस्था से न शामिल कर लिया जाए। 2. गाइडलाइन पर एक्सपर्ट कमेटी को क्या निर्देश दिए थे?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि समाज में कई ऐसे अपमानजनक शब्द प्रचलित हैं, जिनका इस्तेमाल अक्सर स्थानीय बोलियों में खुलेआम किया जाता है। इनमें से कई शब्द अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं, लेकिन लोग अक्सर यह समझे बिना उनका इस्तेमाल करते हैं। अगर एक्सपर्ट कमेटी देश की विभिन्न भाषाओं और बोलियों में प्रचलित ऐसे अपमानजनक शब्दों और अभिव्यक्तियों की पहचान कर सके तो ऐसे शब्दों को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। इनका इस्तेमाल होने से रोका जा सकेगा और यौन अपराध के शिकायतकर्ता व पीड़ित अपने साथ हुई प्रताड़ना और मानसिक आघात का अधिक सटीक और पूर्ण ब्योरा अदालत के सामने रख सकेंगे। पुलिस, वकील और अदालतें उनकी गंभीरता को समझ सकेंगे। 3. किन-किन जगहों पर होगा इस गाइडलाइन का इस्तेमाल?
पटना हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने हैरानी जताई और कहा कि वे रिसर्च करें। अदालत ने 14 जुलाई 2026 को ज्यूडिशियल अकादमी की एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट को मंजूरी दी, जिसमें यौन अपराधों की सुनवाई के दौरान संवेदनशीलता निश्चित करने के लिए गाइडलाइन बनाई गई है। ये गाइडलाइन/कॉपी बुक सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और जिला अदालतों की वेबसाइट पर अपलोड करने के आदेश दिए। इसे नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी, सभी राज्य न्यायिक अकादमियों, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के विधि विभागों को भी भेजा जाए। भारतीय कानून में ‘रेप की कोशिश’ किसे माना जाता है? 25 अक्टूबर 2021 को एक अन्य केस की सुनवाई के दौरान रेप की तैयारी और रेप की कोशिश में फर्क बताया गया था… पटना हाईकोर्ट के इस फैसले का असर, एक्सपर्ट की राय पटना हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट सर्वदेव सिंह कहते हैं कि हाईकोर्ट ने कानून के तहत ही फैसला सुनाया है। इसका निगेटिव इम्पैक्ट पड़ना गलत है। हालांकि, लोगों के बीच इस फैसले को लेकर आक्रोश भी हो सकता है। मगध महिला कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर और साइकोलॉजिस्ट निधि सिंह ने कहा कि ऐसे फैसलों से महिलाओं और बच्चियों में न्याय प्रणाली के प्रति अविश्वास बढ़ेगा। इतनी गंभीर घटना को 'हल्की' धाराओं में बदल दिया जाएगा तो पीड़ित शिकायत करने और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने से हिचकेंगी। अपराधियों का मनोबल बढ़ेगा।

महिला की जबरन छाती दबाना, सलवार उतारना…रेप की कोशिश नहीं:पटना हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी किया; CJI नाराज, कहा- जज रिसर्च करें, गाइडलाइन पढ़ें
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